Wednesday, July 29, 2015

बचपन की अभिलाषा

बचपन की अभिलाषा
 
अभिलाषा है बचपन की, आसमान में उड़ जाये
बादल के संग होली खेलें, चिडियोँ संग बतियायें ।

तितली जैसे पंख लगाकर, परियों जैसे इठलायें
छड़ी जादू की लिए हाथ में, सब पर गोल घुमाएं ।

नन्हें नटखट चेहरों को, नित नित दोस्त बनायें
मिलकर बाग बगीचों से फिर, आम अमरूद चुरायें ।  
 
बादल के गद्दों पर उछलें, चंदा को छू आयें
इन्द्रधनुष के रंगो पर हम, सरपट दौड़ लगाएँ ।  

रिमझिम बारिश में भीगें, कागज की नाव तरायें
बहते पानी में छप छप कर, सब पर छींट उड़ाएँ ।   
 
टॉफी के पेड़ो पर झूलें, तोड़ चॉकलेट खाएं
अजब गज़ब इस दुनियाँ में हम, सपने बुनते जाएँ ।
 
टिम टिम तारों से खेलें, और नभ में चित्र बनाएँ
चंदा मामा के संग मिलकर, दूध बताशे खाएँ ।
 
रोते रोते हँसते है और, हँसते हँसते रो जायें  
अभिलाषा है बचपन की बस ऐसे ही हम रह जाएँ ।

                          -- दीपक भारद्वाज

Wednesday, February 6, 2013

उद्गार

मन विचलित हो गया भारत की स्थिति देखकर, कुछ उद्गार उसके प्रतिबिंब स्वरूप उभर आए ।

उद्गार
 

शस्त्रो में हम पास हो गए, हुए शास्त्र मे फ़ेल,
वेद आग में भभक रहे, बड़ा अजब यह खेल ।
बड़ा अजब यह खेल, संस्कृति बचा न पाते ,
आई डोंट नो हिन्दी, कहकर हर्ष जताते ।

 
वेद पुराणों को भूलकर, इतिहास को झुठलाते है,
राम की शिक्षा को छोड़, रावण हर वर्ष जलाते है ।
आज हम बन रहे विभीषण, पर राम शरण नहीं जाते हैं,
अपनी सुंदर लंका को, गैरों से हम जलवाते है ।   

 
मूल्यहीन हो रहा है भारत, रोज़ निर्भया रोती,
अपना-अपना झण्डा लेकर, मतलब सेके रोटी ।
मतलब सेके रोटी, बेटी हम बचा न पाते,
आदिशक्ति के जन्म पर, आज हम शोक मानते ।

-- दीपक भारद्वाज 
 

Sunday, December 30, 2012

कवि


कवि

 
इस नितांत नीरव वातावरण मे, एक उम्मीद बंधा देते हैं कवि
सोती हुई इस जनता को, फिर से जगा देते है कवि
अंधियारी एक मावस मे, राह दिखा देते हैं कवि
कलम के इन हथियारों से, सरकार हिला देते हैं कवि
 
कवियों के इन बलिदानों को, तुम व्यर्थ न यूं होने देना,
जो चेतना संचार किया, उसको तुम मत रुकने देना
महाकाल की बलिवेदी, तुमसे बलिदान ही मांगेगी
अपना शीश चढ़ा कर तुम, माँ को गर्वित होने देना
कवियों के इन बलिदानों को, तुम व्यर्थ न यूं होने देना

---दीपक भारद्वाज 

Saturday, July 7, 2012

युग परिवर्तन की वेला



युग परिवर्तन की वेला

इस युग परिवर्तन की वेला मे हमे भी कुछ करना होगा ।
आलस्य प्रमाद विलास छोड़, अब क्रियाशील बनना होगा । ॥ धृ ॥


परिवर्तन के काल चक्र से कोई नहीं बच पाया है ।
अंगुलीमाल इस कारण ही वाल्मिकी बन पाया है ।
जगद्गुरु जो भारत था, वही पुनः बनना होगा । ॥ १ ॥
आलस्य प्रमाद विलास छोड़, अब क्रियाशील बनना होगा ।


वीर शिवा की अमर कथाऐ जन-जन को बतलानी हैं ।
गुरु गोविंद के शेरों की ताकत हमको दिखलानी है ।
चाणक्य की शिक्षाओ से, फिर चंद्रगुप्त बनना होगा । ॥ २ ॥
आलस्य प्रमाद विलास छोड़, अब क्रियाशील बनना होगा ।


गजनावी सिकंदर ब्रिटिश फ्रांसीसी जो कोई भी आया है ।
आक्रांताओ के आगे हमने मस्तक नहीं झुकया है ।
भारत के गद्दारों को अब इक-इक कर मरना होगा । ॥ ३ ॥
आलस्य प्रमाद विलास छोड़ अब क्रियाशील बनना होगा ।
इस युग परिवर्तन की वेला मे हमे भी कुछ करना होगा ।
आलस्य प्रमाद विलास छोड़, अब क्रियाशील बनना होगा ।

--दीपक भारद्वाज   

Thursday, July 5, 2012


गीत: नई डगर नया सफर कदम मिला के चल

नई डगर नया सफर कदम मिला के चल । नौनिहाल देश के मुस्कुरा के चल ।  ॥ धृ ॥

पर्वतो को लांघते शेर से दहाड़ते । बढ़ चले ये काफिला मुश्किले पछाड़ते ।
हर कदम नई उमंग मे उठा के चल। ॥ १ ॥  नौनिहाल ...

हाथ हाथ में लिए साथ साथ चल दिया । देश पर सदा मिटे देश के लिए जिये ।
एकता का गीत आज गुनगुनाते चल ॥ २ ॥


अब विकास की किरण खोल रही है नयन । मेघ सरस झूमते हो रही धरा मगन ।
खेत खेत मे किसान को जगा के चल ॥ ३ ॥ 

---साभार बाल पदावली

Tuesday, June 26, 2012

कातर करुण पुकार


कातर करुण पुकार



त्रेता युग मे राम ने, दिया दशानन मार ।

द्वापर मे फिर आपने, लिया कृष्ण अवतार ।

लिया कृष्ण अवतार, गीता हमको बतलाई ।

रचा महा एक युद्ध, भाई से लड़ गया भाई ।

आज पुनः इस धरा पर, अवतारो जगदीश ।

त्राण दिलाओ दुर्बुद्धि से, धरो क्रांति का बीज ।

धरो क्रांति का बीज, विचार परिवर्तन लाओ ।

दुर्बुद्धि है दैत्य, मार तुम इसे गिराओ ।

माँ भारती की पुकार



जाग उठो कमर कसो सब भगिनी और भ्राता।

हम सबको पुकार रही है अपनी भारत माता।



अभी समय है कूच करो मस्तक करके ऊंचा ।

अखिल विश्व मैं कोई नहीं है आर्यव्रत सा दूजा ।  



कातर करुण कृंदन का स्वर पहचानो ऐ वीर ।

भारत माँ का स्वाभिमान मत होने दो तुम जीर्ण ।



करबद्ध हो प्रतिज्ञा लो अपनी माँ की खातिर ।

पाहुचाओ इसे शीर्ष पर पुनः करो प्रस्थापित ।