Wednesday, July 29, 2015

बचपन की अभिलाषा

बचपन की अभिलाषा
 
अभिलाषा है बचपन की, आसमान में उड़ जाये
बादल के संग होली खेलें, चिडियोँ संग बतियायें ।

तितली जैसे पंख लगाकर, परियों जैसे इठलायें
छड़ी जादू की लिए हाथ में, सब पर गोल घुमाएं ।

नन्हें नटखट चेहरों को, नित नित दोस्त बनायें
मिलकर बाग बगीचों से फिर, आम अमरूद चुरायें ।  
 
बादल के गद्दों पर उछलें, चंदा को छू आयें
इन्द्रधनुष के रंगो पर हम, सरपट दौड़ लगाएँ ।  

रिमझिम बारिश में भीगें, कागज की नाव तरायें
बहते पानी में छप छप कर, सब पर छींट उड़ाएँ ।   
 
टॉफी के पेड़ो पर झूलें, तोड़ चॉकलेट खाएं
अजब गज़ब इस दुनियाँ में हम, सपने बुनते जाएँ ।
 
टिम टिम तारों से खेलें, और नभ में चित्र बनाएँ
चंदा मामा के संग मिलकर, दूध बताशे खाएँ ।
 
रोते रोते हँसते है और, हँसते हँसते रो जायें  
अभिलाषा है बचपन की बस ऐसे ही हम रह जाएँ ।

                          -- दीपक भारद्वाज

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