बचपन की अभिलाषा
अभिलाषा है बचपन की, आसमान में उड़ जाये
बादल के संग होली खेलें, चिडियोँ संग बतियायें ।
बादल के संग होली खेलें, चिडियोँ संग बतियायें ।
तितली जैसे पंख लगाकर, परियों जैसे इठलायें
छड़ी जादू की लिए हाथ में, सब पर गोल घुमाएं ।
नन्हें नटखट चेहरों को, नित नित दोस्त बनायें
मिलकर बाग बगीचों से फिर, आम अमरूद चुरायें ।
बादल के गद्दों पर उछलें, चंदा को छू आयें
इन्द्रधनुष के रंगो पर हम, सरपट दौड़ लगाएँ ।
रिमझिम बारिश में भीगें, कागज की नाव तरायें
बहते पानी में छप छप कर, सब पर छींट उड़ाएँ ।
टॉफी के पेड़ो पर झूलें, तोड़ चॉकलेट खाएं
अजब गज़ब इस दुनियाँ में हम, सपने बुनते जाएँ ।
टिम टिम तारों से खेलें, और नभ में चित्र बनाएँ
चंदा मामा के संग मिलकर, दूध बताशे खाएँ ।
रोते रोते हँसते है और, हँसते हँसते रो जायें
अभिलाषा है बचपन की बस ऐसे ही हम रह जाएँ ।
-- दीपक भारद्वाज
-- दीपक भारद्वाज