मन विचलित हो गया भारत की स्थिति देखकर, कुछ उद्गार उसके प्रतिबिंब स्वरूप उभर आए ।
बड़ा अजब यह खेल, संस्कृति बचा न पाते ,
आई डोंट नो हिन्दी, कहकर हर्ष जताते ।
वेद पुराणों
को भूलकर, इतिहास को झुठलाते है,
राम की शिक्षा को छोड़, रावण हर वर्ष जलाते है ।
आज हम बन रहे विभीषण, पर राम शरण नहीं जाते हैं,
अपनी सुंदर लंका को, गैरों से हम जलवाते है ।
मूल्यहीन हो
रहा है भारत, रोज़ निर्भया रोती,
अपना-अपना झण्डा लेकर, मतलब सेके रोटी ।
मतलब सेके रोटी, बेटी हम बचा न पाते,
आदिशक्ति के जन्म पर, आज हम शोक मानते ।
उद्गार
शस्त्रो में हम पास हो गए, हुए शास्त्र मे फ़ेल,
वेद आग में
भभक रहे, बड़ा अजब यह खेल । बड़ा अजब यह खेल, संस्कृति बचा न पाते ,
आई डोंट नो हिन्दी, कहकर हर्ष जताते ।
राम की शिक्षा को छोड़, रावण हर वर्ष जलाते है ।
आज हम बन रहे विभीषण, पर राम शरण नहीं जाते हैं,
अपनी सुंदर लंका को, गैरों से हम जलवाते है ।
अपना-अपना झण्डा लेकर, मतलब सेके रोटी ।
मतलब सेके रोटी, बेटी हम बचा न पाते,
आदिशक्ति के जन्म पर, आज हम शोक मानते ।
-- दीपक भारद्वाज
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